प्रत्यक्ष चुनाव कराने की गहलोत सरकार की रणनीति काम आई
हाइब्रिड, स्टेट हाईवे पर टोल टैक्स लागू करने का नहीं पड़ा असर
जयपुर. कांग्रेस सरकार और संगठन ने महज साढ़े पांच माह के भीतर ही 49 में से 20 निकाय चुनावों को जीतकर भाजपा से अपना हिसाब चुकता कर लिया। लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद कांग्रेस के भीतर जिस तरह से मायूसी, डर और भय का माहौल बना हुआ था, वह निकाय चुनाव के नतीजे आने के साथ ही दूर हो गया। सरकार और संगठन की ओर से अब पंचायत चुनाव की तैयारी शुरू कर दी गई हैं, जिससे फिर भाजपा को मैदान में पटखनी दी जा सके।
नरेंद्र मोदी की लहर में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रदेश की सभी 25 सीटें हार गए थी।
स्थिति यह रही कि सीएम अशोक गहलोत, डिप्टी सीएम सचिन पायलट सहित प्रदेश के तमाम मंत्री अपनी विधानसभा तक को नहीं बचा पाए थे। ऐसे में कांग्रेस को यह लग रहा था कि निकाय प्रमुखों का यदि सीधे चुनाव हुआ तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा। विधायकों, मंत्रियों की राय के बाद राज्य सरकार ने फैसला किया कि निकाय प्रमुखों के चुनाव सीधे नहीं कराए जाएंगे। पार्षदों के जरिए मेयर,सभापति और अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा। यह फैसला ही कांग्रेस सरकार और संगठन के लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ है। यहीं से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनना शुरू हुआ, जिसके बाद चुनाव लड़ने वाले हर पार्षद को यह लगा कि निकाय प्रमुख बनने में उसकी भी लाटरी लग सकती है। ऐसे में हर पार्षद प्रत्याशी ने चुनाव जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी, जिसका फायदा हुआ कि 20 निकायों में कांग्रेस को बहुमत मिल गया। जबकि 10 निकायों में कांग्रेस लीड कर रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि 29 में से 30 से अधिक निकायों में पार्टी का बोर्ड बनना तय माना जा रहा हैं।
यह संख्या 35 से 40 के बीच भी पहुंच सकती है। जबकि भाजपा के भीतर गुटबाजी तेज चल रही हैं, जिसका नतीजा रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से लिए एक धारा 370 हटाने और राम मंदिर जैसे बड़े मुद्दे भी दब गए। इन मुद्दों को भाजपा के नेता मतदाताओं के बीच प्रमुखता से नहीं उठा पाए। खासतौर पर पूर्व सीएम वसुंधरा राजे की दूरी से भाजपा के लिए भाजपा को केवल सात नगर निकायों से ही संतोष करना पड़ा हैं। रोचक तथ्य यह है कि स्टेट हाईवे पर टोल टैक्स लागू करने जैसे बड़े फैसले का भी निकाय चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा। पिछली भाजपा सरकार ने यह टैक्स हटा दिया था।